शहीद वीर नारायण सिंह

शहीद वीर नारायण सिंह 
 सोनाखान,छत्तीसगढ़
(10दिसम्बर  पुण्यतिथि शहीद दिवस)

              छत्तीसगढ़ में 8वी सदी से 17वी सदी तक लगभग 900 वर्षों तक कलचुरियों का शासन था।  सन् 1741 ई. में भोसला सेनापति भास्कर पंत के रतनपुर राज्य पर आक्रमण के साथ ही छत्तीसगढ़ में मराठा का आगमन हो गया था। सन 1758 से मराठा का छत्तीसगढ़ में  प्रत्यक्ष शासन  स्थापित हुआ और छत्तीसगढ़ का पहला मराठा शासक बिम्बाजी भोंसलें था। सन् 1787 में बिम्बाजी भोंसले की मृत्यु के बाद व्यंकोजी भोंसले ने छत्तीसगढ़ में सूबा प्रथा की शुरवात कर सूबेदार नियुक्त कर शासन किया। सूबा प्रथा का छत्तीसगढ़ में गलत प्रभाव और दुष्परिणाम के चलते सूबेदार विट्ठलराव दिनकर ने सन 1818 में  राजस्व व्यवस्था में परगना पध्दति की शुरूआत की और छत्तीसगढ़ को 27 परगनों में बांट दिया गया।  संपूर्ण छत्तीसगढ़ का शासन खालसा और जमींदारी क्षेत्र के रूप में दो भागों में विभाजित कर दिया गया। खालसा क्षेत्र पर मराठों ने  प्रत्यक्ष शासन किया और जमींदारी क्षेत्र को जमींदारों की नियुक्ति कर स्वतंत्र शासन में रखा। जमींदार मराठों द्वारा निर्धारित राशि नियमित एवं निश्चित रूप से कर के रूप में मराठा शासकों को अदा करते थे।

            ऐसा ही एक ज़मीदारी थी सोनाखान, जो वर्तमान छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार जिले के अंतर्गत आता है। सोनाखान का प्राचीन नाम सिंघगढ़ था। 17वी  सदी में सोनाखान राज्य की स्थापना की गई थी। सोनाखान के बिंझवार आदिवासी समुदाय के ज़मीदार फतेनारायन सिंह ने मराठों के छत्तीसगढ़ आगमन से लगातार उनका विरोध कर विद्रोह किया था  ज़मीदार फतेनारायण सिंह के पूर्वज सारंगढ़ के जमींदार के वशंज थे।  सोनाखान के निकट कुर्रूपाट डोंगरी में कुर्रूपाट गोड़, बिंझवार राजाओं के देवता हैं। मराठों द्वारा स्वतन्त्र ज़मीदारी के पश्चात ज़मीदार फतेनारायण सिंह के पुत्र रामराय सिंह को सोनाखान की ज़मीदारी मिली। सन 1817 में ब्रिटिश हुकूमत और मराठों के मध्य तीसरे युद्ध में ज़मीदार रामराय सिंह ने मराठों के साथ अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध मे भाग लिया था किंतु इस नागपुर सीताबर्डी के युध्द में मराठे पराजित हो गए और मराठों और मराठों के सहायक ज़मीदारों को नागपुर में बंदी बना लिया गया था। सन् 1818 में नागपुर की संधि हुई जिससे छत्तीसगढ़ में ब्रिटिश कम्पनी का अप्रत्यक्ष शासन स्थापित हो गया और मराठे और मराठों के अधीन स्वतन्त्र ज़मीदार भी अंग्रेजो के अधीन शासन करने लगे थे। किंतु सोनाखान के ज़मीदार रामराय सिंह ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। सोनाखान की जमींदारी की सीमा में उन्होंने अंग्रेजी सत्ता के कानून तथा आदेशों का पालन करने से इंकार कर दिया। जिसके परिणामस्वरूप सन् 1819 में ब्रिटिश हुकूमत के कैप्टन मैक्सन ने विद्रोह दमन हेतु सोनाखान पर आक्रमण कर दिया। उस वक्त रामराय को अपनी वृद्धावस्था के कारण पराजय स्वीकार कर संधि करनी पड़ी। इस सब घटना का प्रभाव रामराय सिंह के पुत्र और फतेनरायण सिंह के युवां पोते नरायण सिंह पर पड़ा। जिसका जन्म सन 1795 में हुआ था। नरायण सिंह अपने दादा और पिता की बहादुरी और बल से सर्वधिक प्रभावित हए। सन 1830 में पिता रामराय सिंह की मृत्यु के पश्चात 35वर्ष की आयु में नरायण सिंह को सोनाखान की ज़मीदारी मिली।
लोकहित कार्य के कारण नारायन सिंह अपने दादाजी फतेनारायन सिंह तथा पिताजी रामराय के जैसे लोकप्रिय हो गये। 

            स्थानीय मान्यता है कि सोनाखान क्षेत्र में एक बार नरभक्षी शेर का भयंकर  आतंक था। जिसके कारण जनता में भय का वातावरण था। सोनाखान के लोगों की सेवा करने में तत्पर नारायण सिंह ने अकेले जंगल मे जाकर अपने तलवार से नरभक्षी शेर को मार कर जनता को भयमुक्त कर दिए थे। उनकी इस बहादुरी से प्रभावित होकर स्थानीय लोगों ने और  ब्रिटिश सरकार ने उन्हें वीर की पदवी से सम्मानित किया। इस सम्मान के बाद से ज़मीदार नरायण सिंह वीरनारायण सिंह बिंझवार के नाम से प्रसिध्द हुए।

           वर्ष 1856 में छत्तीसगढ़ मध्य क्षेत्र में अल्पवर्षा के कारण जब भयंकर अकाल पड़ा। इसका प्रभाव सोनाखान क्षेत्र  पर सर्वादिक पड़ा जिसके कारण ज़मीदार नारायन सिंह द्वारा ब्रिटिश कम्पनी को कर देने में असमर्थता के साथ सहायता हेतु निवेदन किया। 1854 में ब्रिटिश कम्पनी ने नए ढंग से ज़मीदारों से निश्चित राशि के कर के रूप में टकोली लागू की, इसे जनविरोधी बताते हुए वीर नारायण सिंह ने इसका भरसक विरोध किया था जिससे रायपुर के डिप्टी कमिश्नर चार्ल्स इलियट उनके विरोधी हो गए थे। यही  कारण हैं कि ब्रिटिश कम्पनी द्वारा उनके  निवेदन को नकार दिया गया।इसके पश्चात वीर नरायण सिंह ने अपने बहनोई  देवरी के ज़मीदार और साथ ही कसडोल, कटंगी, भटगांव और बिलाईगड़ के जमीदारो से भी सहायता के रूप में किसानों के लिए अनाज और नई फसल के लिए बीज की मांग की और आश्वस्त किया कि फसल होने पर उनका अनाज लौटा दिया जाएगा। किन्तु सभी ने आकाल के प्रभाव के कारण असमर्थता जताई। उस वक्त वीर नारायण सिंह को यह देखकर बहुत ही अजीब लगा कि कसडोल के व्यापारियों ने अनाज दबाकर रख लिया था। उन्हें बहुत ही दुख हुआ कि लोग भूखें मर रहे हैं मगर व्यापारी सिर्फ पैसों के लिए अनाज का भंडारण कर रहें  थे। तब नारायन सिंह ने कसडोल के एक व्यापारी माखन बनिया के गोदाम का सारा अनाज लूट कर किसानों को बांट दिया। कहा जाता है कि अपने इस कार्य की सूचना नारायन सिंह ने स्वयं रायपुर के अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर इलियट को भी दे दी। कर ना देने के कारणों से अंग्रेजी सत्ता तो नारायन सिंह के विरुद्ध कार्रवाई करने के लिये बहाना ढूंढ़ ही रही थी। कहा जाता है कि अंग्रेजों द्वारा नारायण सिंह पर देवनाथ मिश्र से उधार पैसे लेकर उसकी हत्या का आरोप भी लगाया था और उन्हें कुछ समय के लिए नागपुर में नज़रबंद भी किया गया था। कसडोल के व्यापारी ने अनाज लूटने की घटना का जैसे ही  शिकायत की, तब आसपास के जमीदारों की गवाही से उनकी रिपोर्ट के आधार पर नारायन सिंह को 24 अक्टूबर 1856  को सम्बलपुर में गिरफतार कर लूटपाट और डकैती और कम्पनी के विरुद्ध जाने के जुर्म में रायपुर जेल में डाल दिया गया। डिप्टी कमिश्नर चार्ल्स ईलियट ने इस सम्पूर्ण घटना का विस्तृत वर्णन पत्र के माध्यम से नागपुर में पदस्थ कमिश्नर पलाउडन को दिया था।  इस पत्र में डिप्टी कमिश्नर चार्ल्स ईलियट द्वारा असिस्टेंट कमिश्नर और लेफ्टिनेंट स्मिथ द्वारा कार्यवाही किये जाने और नारायण सिंह पर कठोर सजा देने का भी उल्लेख किया था।  नारायन सिंह अपने पिता और दादा से प्राप्त स्वतंत्रता की भावना को लेकर सोनाखान के जमींदार बने थे। सन् 1857,  यह वह वर्ष है जिसमे देश के सभी हिस्सों में ब्रिटिश कम्पनी के प्रति विरोध में विद्रोह की भावना भड़क रही थी। मेरठ में मंगल पाण्डे के विद्रोह और 8 अप्रैल 1857 को मंगल पाण्डे की शहादत ने देश मे क्रांति की ज्वाला भड़का दी।  देश के क्रांतिकारी बहादुर शाह जफर, पेशवा नाना साहेब, तात्या टोपे, रानी लक्ष्मीबाई आदि ने एकजुट  होकर 10 मई 1857 को क्रांति दिवस घोषित कर प्रतीक के रूप में रोटी और कमल को पूरे अखंड भारत में गुप्त ढंग से सूचना के रूप में भेजना शुरू किया।इसका प्रभाव छत्तीसगढ़ पर भी पड़ा। यह संदेश रायपुर के सैनिकों को भी प्राप्त हुआ। अंग्रेजी फौज़ के हिन्दू और मुसलमान सैनिकों में विद्रोह की अग्नि धधक उठी थी।  संबलपुर के क्रांतिकारी सुरेंद्र साय के नारायण सिंह से अच्छे संबंध थे। सुरेंद्र साय के निर्देश पर रायपुर के सैनिक भी विद्रोह का मौका ढूँढ रहे थे और जब लोगों ने जेल में बन्द वीर नारायण सिंह को अपना नेता चुना तो सैनिकों ने उनकी हर संभव सहायता की। इसी तरह सैनिकों और रायपुर जेल में सजा काट रहे कैदियों और जनता की सहायता से 10 माह से जेल की सजा काट रहे वीर नारायण सिंह अपने तीन साथियों के साथ 28 अगस्त सन् 1857 को सुरंग खोदकर जेल से भाग निकले।  कहा जाता है जेल से भागने में रायपुर छावनी के थर्ड रेगुलर रेजीमेण्ट में मैग्जीन लश्कर के पद पर पदस्थ हनुमान सिंह ने सहायता प्रदान की थी। 

           वीर नारायण सिंह रायपुर जेल से भागकर सोनाखान पहुँचे और वहाँ आदिवासी और किसानों के साथ अंग्रेज विद्रोही सैनिकों को संगठित करके लगभग 500 सैनिकों की एक सेना बनाई और ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ लोगों को एकजुट करने लगे। इसकी सूचना मिलते ही रायपुर के डिप्टी कमिश्नर स्मिथ ने 20 नवम्बर 1857 से अपने अंग्रेज सैनिकों की टुकड़ी के साथ नरायण सिंह को तलास करने लगें और साथ ही उनकी मुड़भेड़ भी होती रही किन्तु हर बार ज़मीदार नरायण सिंह कैप्टन स्मिथ के हाथ नही लगें। अंततः कैप्टन स्मिथ ने सोनाखान के आसपास के नरायण सिंह के विरोधी ज़मीदारों की सूचना और सहायता से बिलासपुर और खरौद क्षेत्र की सेना के साथ मिलकर सोनाखान के आसपास गांवों में आग लगा दी और  कुरूपाट डोंगरी में 30 नवम्बर 1857 को चारो ओर से घेराव करके हमला कर दिया, जिसमे कई जानें गई। अंत में, 2 दिसम्बर 1857 को वीर नारायण सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें रायपुर जेल में डाल दिया गया। डिप्टी कमिश्नर चार्ल्स इलियट द्वारा ज़मीदार नारायण सिंह पर कार्यवाही की सूचना पत्र के माध्यम से कमिश्नर पलाउडन को दी गयी थी, जिसमे ज़मीदार नारायण सिंह बिंझवार के द्वारा आत्म समर्पण की बात की गई है।  नारायण सिंह पर सत्ता के विरुद्ध विद्रोह तथा युध्द छेड़ने के अपराध का मुकदमा चलाया गया और आठ दिनों के अंदर ही  10 दिसम्बर 1857 को वीर नारायण सिंह को सार्वजनिक रूप से रायपुर के मुख्य चौराहें पर फांसी दे दी गयी। आज यह जगह रायपुर के जयस्तम्भ चौक के नाम से प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि अंग्रेजों ने दहशत फैलाने के उद्देश्य से सरेआम चौराहें में पेड़ पर फाँसी दिया गया था। 10 दिन तक उनकी लाश पेड़ पर लटकती रही,चील और कौवों से छतिग्रस्त शव को 19 दिसम्बर 1857 को तोप से बांधकर उड़ा दिया गया था। सम्भवतः यही कारण है कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री अर्जुनसिंह के दखल से पूर्व उनकी पुण्यतिथि 19 दिसम्बर को ही मनाई जाती थी। मुख्यमंत्री अर्जुनसिंह जी के द्वारा ही वीर नारायण सिंह पर सन 1987 में डाक टिकट जारी किया गया था। जिसमे उन्हें तोप से उड़ाते हुए दिखाया गया है। ब्रिटिश हुकूमत और आसपास के ज़मीदारों के दबाव में इससे पूर्व ज़मीदार नारायण सिंह को सिर्फ एक लुटेरा प्रचारित किया गया था जिसका प्रभाव आज भी सोनाखान और आसपास के बुजुर्ग ग्रामीणों से सुनने को मिलता है।
        वीर नारायण सिंह बिंझवार की शहादत ने छत्तीसगढ़ में क्रांति की ज्वाला भड़का दी थी।  वीर नरायण सिंह को सार्वजनिक फाँसी देने और निर्दयतापूर्वक उनके शव को तोप से उड़ाने की घटना से क्रुध्द होकर  18 जनवरी सन् 1858 को रायपुर छावनी की थर्ड रेगुलर रेजीमेण्ट के मैग्जीन लश्कर ठा. हनुमान सिंह के नेतृत्व में हिन्दू और मुश्लिम और शामिल अन्य धर्म के सिपाहियों ने अंग्रेजों के विरुध्द विद्रोह कर किया और इस तरह छत्तीसगढ़ में सर्वथा स्वतंत्रता संग्राम की भावना जाग गई।वीर नरायण सिंह द्वारा स्वतंत्रता हेतु बलिदान की ऐसी मिसाल भारत में कहीं नहीं देखने को मिलती है। वीर नरायण सिंह को छत्तीसगढ़ राज्य के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और शहीद कहा जाता है। 

             शहीद वीर नरायण सिंह,छत्तीसगढ़ के बिंझवार आदिवासी समुदाय से थे जिन्हें पूर्व में राजपूत समुदाय से कहा जाता था। इस विवाद के समापन के साथ ही शहीद वीर नारायण सिंह बिंझवार के सम्मान में छत्तीसगढ़ शासन के आदिम जाति कल्याण विभाग ने उनकी स्मृति में पुरस्कार की स्थापना की है। इसके तहत राज्य के अनुसूचित जनजातियों में सामाजिक चेतना जागृत करने तथा उत्थान के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले व्यक्तियों तथा स्वैच्छिक संस्थाओं को दो लाख रुपए की नगद राशि व प्रशस्ति पत्र देने का प्रावधान है। छत्तीसगढ़ शासन ने वीर नरायण सिंह की स्मृति में आदिवासी एवं पिछड़ा वर्ग में उत्थान के क्षेत्र में एक राज्य स्तरीय वीर नारायण सिंह सम्मान स्थापित किया है।
         सन् 1979 में  स्व शंकर गुहा नियोगीजी द्वारा ही शहीद वीर नारायण सिंह के  बारे में पहली बार विस्तृत लेख  में  लिखा गया था। जिसे छत्तीसगढ़ माईन्स श्रमिक संघ द्वारा प्रकाशित स्मारिका  छत्तीसगढ़ के किसान युद्ध का पहला क्रांतिकारी शहीद वीर नारायण सिंह  में आज की पीढ़ी और वीर नारायण सिंह की वसीयत नाम से प्रकाशित करवाया गया था। उनके सहायक सहदेव साहूजी थे।
           शहीद वीर नरायण सिंह के नाम पर ही छत्तीसगढ़ शासन द्वारा सन 2008 में निर्माण रायपुर स्थित क्रिकेट स्टेडियम है जो ईडन गार्डन कलकत्ता क्रिकेट स्टेडियम के बाद भारत का दूसरा सबसे बड़ा क्रिकेट स्टेडियम है। सोनाखान में आज भी शहीद वीर नारायण सिंह बिंझवार की समाधि स्मारक को देखा जा सकता है। 
            आज आजादी के 72 वर्ष और स्वतंत्रता क्रांति प्रारंभ के 162 वर्षों के बाद जब भी स्वतन्त्रता संग्राम को याद किया जाता है तब 1857 की क्रांति का उल्लेख किया जाता है जिसकी शुरुवात मेरठ से मार्च 1857 को मानी जाती है, वहीं छत्तीसगढ़ में वीर नरायण सिंह ने अक्टूबर 1856 को ही इसकी शुरुवात कर दी थी अतः वीर नरायण सिंह को छत्तीसगढ़ ही नही भारत का प्रथम स्वतंत्रता क्रांतिकारी कहना गलत नही होगा।

जय छत्तीसगढ़।।
जय छत्तीसगढ़ के वीर।।

कमलेश कुमार टाण्डेय

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