छत्तीसगढ़ में मराठा शासन

छत्तीसगढ़ में मराठा
(छत्तीसगढ़ में छत्रपति शिवाजी महाराज)

          छत्तीसगढ़ एक ऐसा राज्य जो ना केवल भौगोलिक रूप से, वन संपदा, खनिज, कृषि उत्पादन, सांस्कृतिक रूप से सम्पन्न है बल्कि ऐतिहासिक रूप से भी परिपूर्ण है। भौगोलिक सीमा की दृष्टि से छत्तीसगढ़ चारों ओर पर्वतों से घिरा हुआ है और मध्य भाग उपजाऊ भूमि के रूप में लहलहाती नदियों से परिपूर्ण रहा है। इस राज्य की प्राकृतिक संरचना मानव सभ्यता हेतु सुरक्षा प्रदान करती है। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ में विभिन्न सभ्यताओं और संस्कृतियों का जन्म हुआ। राज्य की भौगोलिक सुरक्षात्मक संरचना ने यहां की सभ्यता और संस्कृतियों की रक्षा की। 
           प्रागैतिहासिक काल से ही यह राज्य मानव सभ्यता के विकास को प्रमाणित करता है। पौराणिक काल मे जहां त्रेतायुग में प्रभु श्रीराम और द्वापरयुग में प्रभु श्रीकृष्ण के आगमन का आलेख है वही ऐतिहासिक पुरातात्त्विक साक्ष्य महात्मा गौतम बुद्ध के आगमन की भी पुष्टि करते है। 
छत्तीसगढ़ की भूमि ने मौर्य काल के शासकों से लेकर कलचुरियों तक को आकर्षित किया है। इसी का परिणाम है कि हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा रखने वाले मराठों को भी छत्तीसगढ़ ने प्रत्यक्ष शासन के लिए आकर्षित किया था। छत्तीसगढ़ में मराठों का आगमन सन् 1741 में हुआ था। छत्तीसगढ़ में मराठा शासनकाल सन 1741 से 1818 के मध्य तक था। यह काल छत्तीसगढ़ के आधुनिक इतिहास(1741-1947) का काल था।

            मराठा हिन्दू धर्म मे 96 विभिन्न कुलों की जातियों का एक समूह है जिसे 96 कुलि मराठा या शाहन्नो कुले  के रूप में जाना जाता है, जिसे मरहट्टा या मारहट्टा कहा जाता था इसी से मराठा शब्द की उत्पत्ति हुई है। मराठा समूह का उदय एवं निवास वर्तमान महाराष्ट्र राज्य में हुआ था।  सन 1518 में बहमनी सल्तनत के विघटन के फलस्वरूप दक्कन सल्तनत (डेक्कन) का उदय हुआ जिसमें गोलकुण्डा, बीजापुर, बिदर, बिरार और अहमदनगर के राज्य शामिल थे। मराठों की साहस और सक्रियता के कारण दक्कन सल्तनत में सेना के रूप में इनकी सर्वादिक भर्ती हुई। 
मराठा दक्कन सल्तनत की सेनाओं में सेवा करने वाले यौद्धा सैनिकों के पद के रूप में उभरा। इन्ही दक्कन सल्तनत में शहाजी राजे भोंसले मराठा योद्धा सेना नायक के रूप में कार्य करते थे। मराठा  तुलजापुर में स्थापित  तुलजा भवानी को अपनी कुलदेवी मानते  हैं। शहाजी राजे भोंसले का विवाह यादव कुल की जीजाबाई से हुआ था।  शहाजी राजे भोंसले और जीजाबाई के घर ही महान यौद्धा छत्रपति शिवाजी महाराज भोंसले का जन्म हुआ था। छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म 20 जनवरी 1627 कुछ विद्वानों के अनुसार  19 फरवरी 1630 में पुणे के पास शिवनेरी दुर्ग में हुआ था। 16 वर्ष की अल्प आयु में ही शिवाजी महाराज ने अपने विश्वासपात्रों को इकट्ठा कर अपनी ताकत बढ़ानी शुरू कर दी।  छत्रपति शिवाजी महाराज  ने ही पहली बार छापामार गुरिल्ला युद्ध पद्धति का आरम्भ किया था। इस यद्ध पद्धति को आज अनेक देशों ने अपनी सेना में शामिल किया है। इस युद्ध का उल्लेख उस काल में रचित 'शिव सूत्र' के रूप में मिलता है।  शिवाजी महाराज ने ही सर्वप्रथम नौसेना का गठन भी किया था। हिन्दू पद पादशाही के संस्थापक और मराठी भाषा में 'दासबोध' नामक ग्रन्थ के रचनाकार गुरु समर्थ रामदासजी शिवाजी महाराज के गुरु थे। जिनकी प्रेरणा से शिवाजी महाराज ने सन 1660 के दशक तक एक स्वतंत्र मराठा राज्य की स्थापना की थी।
 
          शिवाजी महाराज का विवाह 14 मई, 1640 में सइबाई निम्बालकर के साथ हुआ था। शिवाजी महाराज की कुल आठ पत्नियां थी। शिवाजी महाराज के बढ़ते प्रभुत्व और सम्राज्य के दमन के लिए 1659 में बीजापुर सल्तनत के शासक आदिलशाह ने अपने सेनापति अफज़ल खान को प्रतापगढ़ किले में शिवाजी पर आक्रमण के लिए भेजा था किन्तु शिवाजी महाराज ने अपनी सूझबूझ से अफ़जल खान के विश्वासघाती समझौता मुलाकात के दौरान बघनखा से उसी की हत्या कर दी। इस तरह शिवाजी की ख्याति और प्रभाव और मराठा साम्राज्य बढ़ता गया। मराठा साम्राज्य के विस्तार और सूरत आक्रमण  के कारण मुगल सम्राट औरंगजेब ने शिवाजी महाराज को युद्ध में हराने के उपरांत 24 किले वापसी हेतु समझौते पर हस्ताक्षर हेतु आगरा के दरबार में बुलावा भेजा।  शिवाजी महाराज 9 मई, 1666  को अपने पुत्र शम्भाजी एवं  4000 मराठा सैनिकों के साथ मुग़ल दरबार में उपस्थित हुए, परन्तु औरंगज़ेब द्वारा उचित सम्मान न देने पर शिवाजी ने भरे हुए दरबार में औरंगज़ेब को विश्वासघाती कहा। इससे नाराज होकर औरंगजेब ने शिवाजी और उनके पुत्र को  जयपुर भवन में क़ैद कर दिया था। शिवाजी 13 अगस्त  1666 ई को फलों की टोकरी में छिपकर फ़रार हो गए और 22 सितम्बर को रायगढ़ पहुंचे।

         कहा जाता है कि शिवाजी महाराज की यह यात्रा छत्तीसगढ़ में रतनपुर से रायपुर और चन्द्रपुर होते हुये हुई थी।
इतिहासकार डॉ आर जी शर्मा के ग्रंथ छत्तीसगढ़ के दर्पण और डॉ पुरुषोत्तम जे देवरस के अनुसार छत्रपति शिवाजी महाराज  जयपुर भवन से फरार होने के उपरांत अपने पुत्र शम्भाजी को मथुरा में दासोजी पंत के पास छोड़कर कृष्णाजी पंत के साथ फतेहपुर  से यमुना नदी पार करके इटावा, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणशी और मिर्जापुर होते हुए छत्तीसगढ़ के सरगुजा रियासत के घने जंगलों में पहुँचे थे। मुगल सेना शिवाजी का पीछा कर रही थी और छत्तीसगढ़ मुगल साम्राज्य के आधिपत्य से मुक्त था इसलिये शिवाजी महाराज ने इस राह का चयन किया था। शिवाजी सरगुजा रियासत से रतनपुर गए  इस समय रतनपुर में सम्भवतः जगमोहन साय का शासन था। 
              (चित्र- रतनपुर का किला)
रतनपुर से  रायपुर जहाँ कलचुरी शासक बलदेवसिंह देव राजा थे और यहां से चन्द्रपुर फिर चिन्नूर करीमगंज, गुलबर्गा, मंगलबेड़ा होते हुए 22 सितम्बर 1666 को रायगढ़ पहुँचे थे। इस यात्रा विवरण को औरंगजेब मुगलकाल के  इतिहासकार खाफीखां ने भी मान्य किया है।

          सन 1673 तक शिवाजी का मुगल साम्राज्य से संघर्ष  के उपरांत पुरन्दर की संधि में गवाएं गए सारे प्रदेश पर अधिकार हो चुका था। किन्तु उन्हें शासक या राजा की उपाधि नही मिली थी।शिवाजी के भोंसले समुदाय को  मराठवाड़ा में निचली जाति समझा जाता है। जबकि भोंसले खुद को क्षत्रिय घोषित किये थे। मराठवाड़ा में सामन्त, ब्राह्मणों और मुग़ल साम्राज्य द्वारा शिवाजी को नीची जाति का मानने और उनके राज्याभिषेक पर मृत्युदण्ड के भय द्वारा प्रतिबन्ध के कारण शिवाजी महाराज ने काशी के मशहूर पण्डित गागा भट्ट से  6 जून 1674 को रायगढ़ में वैदिक रीतिरिवाजों से अपना राज्याभिषेक करवाया और छत्रपति की उपाधि धारण कर छत्रपति शिवाजी महाराज भोंसले कहलाये।।
 इस भव्य राज्याभिषेक समारोह में सभी प्रांतों के सहयोगी राजा के साथ छत्तीसगढ़ रतनपुर और रायपुर के शासक भी शामिल हुए थे। जिनकी सहायता से इलाहाबाद, वाराणशी से छत्तीसगढ़ होते हुए वे रायगढ़ पहुंचे थे। उन्होंने उपहार स्वरूप हाथी की पेशकश की जिसे  छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपने वाहक के रूप में उपयोग किया था। छत्तीसगढ़ राज्य से ही मुगलों के लिए गजराज(हाथी) का प्रबंध किया जाता था। मुगल सेना में शामिल हाथी छत्तीसगढ़ से ही आयात किया जाता था। रतनपुर कलचुरी शाखा के कल्याण साय जिनका शासन काल 1544 से 1581 ई. के मध्य था ने ही भूव्यवस्थापन जमाबंदी पद्धति की शुरुवात की थी जिसे अकबर के नवरत्न दरबारी टोडरमल ने अपनाया था। कल्याण साय अकबर के प्रमुख दरबारी थे, उन्होंने ही हाथी को मुग़ल साम्राज्य की सेना में नियमित रूप से शामिल करवाया था। इसका उल्लेख सन् 1861 से 68 के मध्य बि‍लासपुर ज़ि‍ले का पहला बंदोबस्त करते हुए अंग्रेज़ बंदोबस्त अधिकारी चीज़म ने किया था और इसी जमाबंदी को आधार बनाया था। 
          छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपनी जाति समुदाय,राज्याभिषेक में परेशानी और रूढ़िवादी विचारधारा के कारण प्राचीन हिन्दू राजनीतिक प्रथाओं तथा दरबारी शिष्टाचारों को पुनर्जीवित किया और फारसी के स्थान पर मराठी एवं संस्कृत को राजकाज की भाषा बनाया। जिसका प्रभाव आज तक छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ की भाषा मे देखने को मिलता है। शिवाजी महाराज ने अष्टप्रधान की अवधारणा रखी थी इसमें समस्त राज्यशक्ति राजा अपने हाथ मे रखता है और अष्टप्रधानों की सहायता से शासन करता था, अष्टप्रधानों का प्रमुख प्रधानमंत्री पेशवा कहलाता था। अन्य सात वित्त, लेखागार, पत्राचार, वैदेशिक मामले, सेना, धार्मिक कृत्य एवं दान तथा न्याय विभाग के प्रधान होते थे। धार्मिक तथा न्याय विभागों के प्रधानों को छोड़कर बाकी अष्टप्रधान सैन्य अधिकारी और यौद्धा भी होते थे।
मराठा हिन्दू तथा मुसलमान शासन एवं सैन्य व्यवस्था का मिश्रित रूप है। सर्वप्रथम शिवाजी ने इसका सूत्रपात किया था। लंबी बीमारी के कारण 3 अप्रेल 1680 को सन्दिग्ध परिस्थितियों में सम्भवतः विष देने के कारण शिवाजी महाराज की मृत्यु हो गयी। उनकी मृत्यु के बाद, उनके पुत्र सांभाजी महाराज  राजा बने और लंबे संघर्ष के बाद युद्ध में औरंगजेब को पराजित किया था। संभाजी ने 14 वर्ष की आयु में बुधभूषणम् (संस्कृत), नायिकाभेद, सातसतक, नखशिख (हिंदी) इत्यादि ग्रंथों की रचना करने वाले विश्व के प्रथम बालसाहित्यकार थे। 
          संभाजी ने पेशवाओं सहित मराठों द्वारा एक विशाल मराठा साम्राज्य का विस्तार किया था। 17वीं शताब्दी तक सम्पूर्ण मराठा साम्राज्य बड़ौदा के गायकवाड़ , इंदौर के होलकर , ग्वालियर की सिंधियां , धार और देवास के पवार , और नागपुर के भोसले में विभक्त हो गया था। सम्भाजी की मृत्यु के उपरांत शिवाजी के द्वितीय पुत्र और सम्भाजी के सौतेले भाई राजराम भोसले शासक बने राजाराम के बाद उनके पुत्र शिवाजी द्वितीय और उनके के बाद सम्भाजी के पुत्र शिवाजी  जिन्हें छत्रपति शाहूजी महाराज कहा जाता है, ने शासन किया था।

        17वी सदी में छत्रपति शाहूजी महाराज के शासनकाल में बाजीराव पेशवा के पुत्र बालाजी बाजीराव उनके पेशवा थे।  सन् 1739 में नागपुर के शासक चाँद सुल्तान की मृत्यु के बाद छत्रपति शाहूजी महाराज के  सम्बन्धी और सेनापति  देउर ग्राम सातारा के  राघोजी या  रघुजी राव भोसले ने मराठों की ओर से नागपुर पर कब्जा कर लिया और  नागपुर में भोंसले शासक के रूप में पदस्थ हुए। रघुजी राव भोसले मराठा संघ एक महान योद्धा था। 
          17वी शताब्दी यह छत्तीसगढ़ का वह समय था जब शक्तिशाली कलचुरी सम्राज्य रतनपुर और रायपुर में विभक्त होकर कमज़ोर हो चुका था। रघुजी राव भोंसले नए शासन स्थापना के साथ ऋणगस्त थे धन की महत्वकांक्षा से अपने आक्रमक सेनापति भास्कर पन्त की अगुआई में पूर्वी भारत के क्षेत्र बंगाल, बिहार, उड़ीसा  पर आक्रमण कर अपना प्रभुत्व स्थापित करने लगे थे। यह आक्रमण बुंदेलखण्ड होते हुए बिहार, बंगाल, उड़ीसा के रास्ते होता था।  इन आक्रमणों से 1740 में  बंगाल के नवाब बने मिर्ज़ा मुहम्मद ख़ाँ' उर्फ़ अलीवर्दी ख़ाँ को अत्यधिक हानि हुई। इन आक्रमणों से  मराठा सेना को होने वाली हानि और रसद की आवश्यकता के लिए भोसले शासक रघुजी राव  द्वारा रतनपुर और रायपुर के कलचुरी शासकों को सहायता का संदेश दिया जा चुका था। किन्तु रतनपुर के कलचुरी शासक हैहय वंशी 60 वर्षीय रघुनाथ सिंह इस समय अपने एकमात्र पुत्र के मृत्यु शोक से पीड़ित और आर्थिक और सैन्य रूप से कमज़ोर थे। साथ ही रायपुर के कलचुरी शासक अमरसिंह देव की आर्थिक स्थिति भी ठीक नही थी।
          सन 1741 में भोंसले सेनापति भास्कर पंत को पुनः बंगाल पर आक्रमण का आदेश हुआ। भास्कर पन्त 30 हजार सैनिकों के साथ बुन्देलखण्ड पहुँचा और पुनः रतनपुर के शासक रघुनाथ सिंह और रायपुर के शासक अमर सिंह देव से धन, रसद आदि की सहायता मांगी। रतनपुर से किसी भी प्रकार की सहायता ना मिलने पर भास्कर पंत क्रोधित हो गया और अपनी सेना के साथ बुंदेलखण्ड से कुच कर पेंड्रा के रास्ते मराठा सेना रतनपुर पहुँची इससे घबराकर रायपुर के कलचुरी शासक अमरसिंह देव ने आंशिक सहायता की। साहित्यकार और इतिहासकार प्यारेलाल गुप्त के अनुसार रायपुर के शासक अमरसिंह और कलचुरी शासक मोहन सिंह  मराठों के साथ मिला हुआ था।  रतनपुर के शासक रघुनाथ सिंह द्वारा अपनी दयनीय आर्थिक स्थिति के कारण धन नहीं भिजवाया गया। मराठा सैनिकों द्वारा रतनपुर किले को घेर लिया गया। कहा जाता है कि आपने राजा रघुनाथ सिंह की सहायता के लिए छुरी के जमींदार राघोसिंह अपने अन्य ज़मीदार साथियों और सैनिकों के साथ मराठा सैनिकों से युद्ध किये थे। भास्कर पन्त ने जमींदार राघोसिंह को मार डाला और अपनी नीति और चतुराई से कुछ ज़मीदारों  को अपने पक्ष में करके  किले का मुख्य द्वार फोडकर वे अंदर घुस गए थे। मारकाट देखकर अनहोनी और मृत्यु के भय से  रघुनाथसिंह की दोंनों पत्नियों लक्ष्मण कुंवर और पदम कुंवर ने  सफेद वस्त्र  का झंडा लहराकर युध्द समाप्त करने की विनती की जिसके कारण भास्कर पंत ने युध्द को रोक दिया शर्त के मुताबिक मराठों ने एक लाख रुपए हरजाने के रुप में वसूल किया। और राजकोष आसपास के विरोधी ज़मीदारों का सारा धन लूट लिया। इस प्रकार मराठों का छत्तीसगढ़ में पदार्पण हो गया। 
रघुजी राव भोंसले के आदेश पर भास्कर पंत ने रतनपुर शासक रघुनाथ सिंह और रायपुर शासक अमर सिंह को नागपुर भोसला शासक के प्रतिनिधि के रूप में शासन करने का अधिकार दिया। साथ ही भास्कर पंत ने  मराठा हित मे कुली नगीर नामक व्यक्ति को दरबार मे नियुक्त किया। सन 1745 में रघुनाथ सिंह की मृत्यु उपरांत सहयोगी शासक मोहन सिंह को मराठा प्रतिनिधि शासक के रूप में नियुक्त कर दिया गया। सन 1750 में भोंसलो  ने रायपुर शासक अमर सिंह को भी शासन मुक्त कर रायपुर, राजिम, और पाटन परगने  7000रु वार्षिक कर के रूप में दे दिए। सन 1753 में अमरसिंह की मृत्यु उपरांत उत्तराधिकारी शिवराज सिंह से यह जागीरें भी छीन कर उसे मात्र 5 गांव बिना कर के दे दिया गया। इस तरह  900 वर्षो तक छत्तीसगढ़ में शासन करने वाले हैहयवंशी कलचुरी शासकों का शासन बड़े ही अपमानजनक रूप से समाप्त हुआ। छत्तीसगढ़ में   मराठों का प्रभुत्व होने के कारण मराठे छत्तीसगढ़ रायपुर सारंगढ़ सम्बलपुर के रास्ते उड़ीसा बिहार और बंगाल पर आक्रमण करने लगे थे।
       मराठा भास्कर पन्त के अचानक आक्रमणों से क्षुब्ध होकर बंगाल नवाब अलीवर्दी खां ने योजनाबद्ध तरीके से उड़ीसा कटक में भास्कर पंत और 20 सैनिकों की हत्या करवा दी थी। भास्कर पन्त की मृत्यु के उपरांत रघुजी राव भोसलें का पुत्र बिम्बाजी भोसलें ने भोसला सेनापति की जिम्मेदारी संभाली और पूर्वानुसार बंगाल बिहार पर आक्रमण करते रहे। बिम्बाजी राव भोसलें एक महान यौद्धा था। जिसने भास्कर पंत और अपने पिता रघुजी राव भोसलें से युद्ध का  प्रशिक्षण लिया था। बिम्बाजी राव भोसलें मार्ग बदलकर आक्रमण करने में माहीर थे। 
       10 वर्ष तक लगातार बंगाल में मराठा आक्रमणों को उस समय विराम मिला जब 1751 ई. में अलीवर्दी खां ने मराठों से  संधि कर ली। जिसके फलस्वरूप बंगाल नवाब द्वारा मराठो को चौथ के रूप में  वार्षिक कर दिया जाने लगा।
मराठा विदेशी या मुग़ल नियंत्रण के मालगुजार क्षेत्रों पर आक्रमण करके दो प्रकार के कर वसूली करते थे, एक को 'सरदेशमुखी' कहते थे। यह मालगुजारी एक-दसवें भाग के बराबर होता था। दूसरा 'चौथ' कहलाता था। यह मालगुजारी के एक-चौथाई भाग के बराबर होता था। चौथ देने वाले को लूटा नहीं जाता था। इसलिए महाराष्ट्र से बाहर के लोगों की दृष्टि में मराठा शासन व्यवस्था लूट-मार और आतंक पर आधारित मानी जाती थी। मराठा साम्राज्य के विस्तार के साथ लूट-मार की यह प्रतृत्ति बढ़ती गयी और शिवाजी महाराज द्वारा स्वराज्य की भावना के आधार पर राज्य विस्तार की नीति का अंत होने लगा था। मराठों के इसी आतंक के  भय से  ब्रिटिश कम्पनी ने कलकत्ता के फोर्ट विलियम के चारों ओर खाई बना दी थी। सन 1756 में अलिवर्दी खान की मृत्यु हो गयी थी।
 नागपुर भोसला शासक रघुजी राव भोसलें अपनी मृत्यु(सन 1755) से पूर्व ही अपने  बेटों में राज्य का बंटवारा कर दिया था और अपने पुत्र बिम्बाजी राव भोसलें को अपने सहायक के रूप में रतनपुर राज्य में नियुक्त किया था। 
     सन 1758 में मराठा प्रतिनिधित्व शासक मोहन सिंह की मृत्यु के उपरांत, बिम्बाजी ने    स्वतन्त्रतापूर्वक शासन आरम्भ कर दिया और रतनपुर के 18 गढ़ और रायपुर के 18 गढ़ो को मिलाकर पुनः छत्तीसगढ़ राज्य की अवधारणा रखी।छत्तीसगढ़ का पहला मराठा शासक बिम्बाजी भोंसले था। राजा बनते ही बिम्बाजी ने अन्यत्र आक्रमण और राज्य विस्तार की नीति को समाप्त कर छत्तीसगढ़ राज्य पर कुशल नीति से शासन किया। बिम्बाजी ने मराठों और स्थानीय जनता की भर्ती कर नागपुर से पृथक स्वतन्त्र सेना का गठन किया साथ ही रतनपुर और रायपुर में जनता की समस्याओं के निदान हेतु दरबार का आयोजन करते थे।   बिम्बाजी ने छत्तीसगढ़ में मराठी, मोड़ी और उर्दू भाषा का प्रयोग करवाया जिसका प्रभाव आज तक छत्तीसगढ़ की भाषा मे देखने को मिलता है। बिम्बाजी ने न्याय व्यवस्था के लिए स्थायी न्यायालय की स्थापना रतनपुर में की थी। उन्होंने मराठा पद्धतियों द्वारा ही राजस्व सम्बंधित कार्य हेतु परगना पद्धति का सूत्रपात किया था। बिम्बाजी ने नागपुर भोसलें शासन से विभक्त रूप से ज़मीदारों पर स्वतन्त्र नियंत्रण रखा और राजनांदगांव और खुज्जी दो नए ज़मीदारी का गठन किया था। बिम्बाजी ने जमीदारो से टकोली कर के रूप में वसूला चांगभखार, कोरबा, धमधा और खैरागढ़ के जमीदारो द्वारा टकोली के विरोधस्वरूप बिम्बाजी द्वारा आक्रमण किया गया था। बिम्बाजी ने कोरबा के ज़मीदार से ज़मीदारी जब्त कर ली थी। कहा जाता है कि धमधा पर आक्रमण करने पर, पराजय के भय से जमींदार ने अपनी पत्नी के साथ जल समाधि ले ली थी।बिम्बाजी धार्मिक सहिष्णुतावादी राजा थे। इनके शासन काल मे मराठों के साथ अन्य धर्मों और जातियों के लोगों का छत्तीसगढ़ में आगमन हुआ था जो यहां स्थाई रूप से बस गए है। छत्तीसगढ़ में आज भी बहुत से ऐसे गाँव हैं जहाँ के मालगुजार मराठा हैं। छत्तीसगढ़ में इसे गौंटिया कहा जाता है।
 बिम्बाजी द्वारा रतनपुर में सुमेर दरवाजा और किले का पुनर्निर्माण के साथ कई महत्वपूर्ण निर्माण कराए गए जिसमे प्रमुख रूप से रामटेकरी का राम मंदिर है। 
 बिम्बाजी की तीन पत्नियां - आनदीबाई, उमाबाई, रमाबाई थी। उन्होंने किले के चारों ओर खाईयां खुदवाई थी। साथ ही बिलासपुर में अपनी कुल देवी खंडोवा तुलजा भवानी का मंदिर, लक्ष्मीनारायण मंदिर बनवाया था।
 बिम्बाजी ने मुसलमानों के लिए रतनपुर में मस्जिद का भी निर्माण करवाया था। 
बिम्बाजी ने रायपुर में  रामानन्दी सम्प्रदाय संत राजस्थान निवासी मात्र दूध धारण करने वाले बालमुकंद बलभद्र दास द्वारा संस्थापित और हैहयवंशी शासक (सम्भवतः चामुंड सिंह देव) द्वारा 1553-1554 में निर्मित दूधाधारी मठ का पुनःनिर्माण करवाया था। साथ ही मठ के लिए जमीन दान की। इसका क्षेत्र मठ(मन्दिर) से पुरैना ग्राम तक था जिसे आज मठपुरैना कहा जाता है।
 इसी के प्रांगण में विजयादशमी(दशहरा) रावण दहन उत्सव मनाने की शुरुआत हुई इस स्थान को रावनभाटा कहते है,जहां बिम्बाजी ने स्वर्ण पत्र देकर विजयादशमी में स्वर्ण पत्र (सोना पत्ती) देने की प्रथा की शुरुआत की जो आज तक चली आ रही है।  रायपुर के पुरानी बस्ती क्षेत्र में तालाब कुएं और बिलासपुर में जुना बिलासपुर क्षेत्र में बावली कुँए का भी निर्माण भी बिम्बाजी ने ही करवाया था। बिम्बाजी ने कलचुरी राजा कल्याण साय के समय से चली आ रही स्थानीय छेरछेरा पर्व आदि को राज्य स्तर पर मनाने की पंरपरा की शुरुआत की और साथ ही मकर संक्रान्ति, गणेश चतुर्थी का आयोजन किया जाने लगा।बिम्बाजी के शासनकाल में रतनपुर और रायपुर में संगीत और साहित्य का  विकास हुआ। बिम्बाजी ने मठ/सन्त/पण्डित और साहित्यकारों कवि के लिए अनुदान प्रारम्भ किया था। बिम्बाजी ने  रायपुर के कलचुरी शासको द्वारा अर्द्ध निर्मित बूढ़ातालाब के पुनर्निर्माण की नींव रखी थी जिसे इनकी मृत्यु उपरांत सूबेदार महिपत राव दिनकर ने पूर्ण निर्माण करवाया था। बिम्बाजी के शासनकाल में बस्तर में चालुक्य वंश के उत्तराधिकारी की लड़ाई के रूप मे 1774 से 1779 के मध्य तक  हल्बा क्रांति ने बस्तर पर भी मराठा साम्राज्य की नींव डाल दी थी।
बिम्बाजी द्वारा रतनपुर से ज्यादा रायपुर के गढ़ो की ज़मीदारी पर नियंत्रण और टकोली में अंतर के कारण रायपुर के सुवरमार गढ़  के समीप प्लासिनी(जोंक) नदी के तट पर स्थित सोनई गढ़(नर्रा) ज़मीदारी के कंवर भैना राजाओं ने  विद्रोह आरंभ कर दिया था। जिसके दमन के लिए स्वयं बिम्बाजी भोसलें ने नर्रा क्षेत्र में विद्रोहियों से लड़ाई की थी और विद्रोह का दमन कर दिया था। इस लड़ाई में बिम्बाजी गम्भीर रूप से घायल हो गए और  दिसम्बर सन 1787 में उनकी मृत्यु हो गयी। मृत्यु स्थल पर ग्राम नर्रा में ही बिम्बाजी के सेनानायक भवानी पण्डित ने समाधि स्थल का निर्माण करवाया और पत्र के माध्यम से इसकी सूचना नागपुर शासन को दी थी। इसका उल्लेख ब्रिटिश कम्पनी के गवर्नर जनरल ने अपने शोक संदेश में भी किया है।
 बिम्बाजी की मृत्यु से शोकग्रस्त उनकी मंझली पत्नी उमा बाई रतनपुर में सती हुई थी। जिनकी याद में रतनपुर में स्थित सती चौरा का निर्माण बिम्बाजी की पत्नी आनदीबाई और  रमाबाई ने  करवाया था। इनकी मृत्यु के समय में यूरोपीय यात्री कोलब्रुक छत्तीसगढ़ आये थे। कोलब्रुक ने अपनी किताब में लिखा है की बिम्बाजी की मृत्यु से जनता को सदमा पंहुचा था, क्योंकि उनका शासन जनहितकारी था, वह जनता का शुभचिंतक व उनके प्रति सहानुभूति रखने वाला था।

बिम्बाजी की मृत्यु के बाद जब  व्यंकोजी राव भोसले राजा बने तब उन्होंने नागपुर से ही छत्तीसगढ़ का शासन चलाने का निर्णय किया और सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ को सूबा में विभक्त कर सन 1787 से सन 1818 तक सूबेदारों द्वारा नागपुर से ही शासन किया। इस तरह रतनपुर का राजनितिक परिचय समाप्त हो गया।  मराठा सूबेदारों के वंशज आज भी छत्तीसगढ़ में रहते हैं। 
....क्रमशः

(प्रस्तुत चित्र बिम्बाजी भोंसले की समाधि स्थल ग्राम नर्रा(कोमाखान), दूधाधारी मठ रायपुर, लक्ष्मीनारायण मन्दिर रतनपुर,रामटेकरी मन्दिर रतनपुर, रतनपुर का किला,
सुमेर द्वार रतनपुर, तुलजा भवानी मन्दिर)

कमलेश कुमार टाण्डेय

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