संत गुरु घासीदासजी
संत गुरु घासीदास बाबा
गिरौदपुरी, छत्तीसगढ़
भारत मे प्राचीनकाल से सभ्यता विकास के साथ विभिन्न संस्कृतियों का जन्म हुआ उसी के साथ ही सतपंथ संस्कृति का भी प्रचलन प्रमुख रूप से हुआ। आदिकाल से मानव ने खुद को वर्णों में विभक्त कर लिया था। कालांतर में 563 ईसापूर्व महात्मा गौतम बुद्ध के आविर्भाव के साथ उन्होंने आर्य, अनार्य, द्रविड़, स्वर्ग-नर्क, वेद उपनिषद और वर्ण व्यवस्था को नकार कर एक नए सतधर्म का विकास किया। ततपश्चात बौद्ध धर्म के अनुयायी सतधर्मी कहलाये। निम्न और पिछड़े वर्ग के उत्थान और विकास के लिए सर्वप्रथम काशी के महान सन्त बाबा रविदास जिन्होंने "मन चंगा तो कठौती में गंगा" की अवधारणा को साकार किया था, ने ही सतमार्ग पर चलने का आह्वान किया। ततपश्चात गुरु नानक जी ने एक ईश्वर के लिए 'सतनाम' शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया था। इसी सतनाम विचार को कबीरदासजी ने और महान संत जगजीवनदास जी व्यापक रूप दिया था। कहा जाता है कि सबसे पहले संतों में गुरुनानकजी ने ही पंथ रचना का सूत्रपात किया था। संभवतः इसके पश्चात ही कबीर पंथ की स्थापना हुई। इसी कड़ी में गुरू घासीदास जी छत्तीसगढ़ की धरती पर अवतरित ऐसे युग-पुरूष हैं, जिन्होेंने सामाजिक क्रांति के द्वारा समाज में नई चेतना का उद्भव कर "सतनाम पंथ" की स्थापना की।
हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के अंतर्गत नारनौल नाम का एक नगर है। सन्त रविदासजी के शिष्य उधा दास ने नारनौल क्षेत्र में सतनाम साध का प्रचार किया था। जिसका विस्तार इस क्षेत्र में बीरभान साध और जोगीदास साध भाइयों ने किया था। सन 1672 में मुगल बादशाह औरंगजेब के शासनकाल में बीरभान साध के अनुयायी किसान का एक मुगल सिपाही से सलाम नही करने की बात पर हुए विवाद ने भयंकर विद्रोह का रूप ले लिया था। इसे सतनामी विद्रोह कहा गया था, जिसका नेतृत्व सतनामी साध बीरभान और उनके भाई जोगीदास साध ने किया। इस विद्रोह के दमन के लिए मुगल बादशाह औरंगजेब ने अपनी सेना भेजकर सभी सतनाम साध लोगों मार देने का आदेश दिया। सतनामी दलित वर्ग से थे और अधिकांश इतिहासकार इनके प्रति घृणित मानसिकता से ग्रस्त रहे हैं। इतिहासकार यदुनाथ सरकार जी ने अपनी किताब ‘ए हिस्ट्री आॅफ औरंगजेब’ में इसी मानसिकता के साथ बहुत विकृत रूप में सतनाम साध का उल्लेख किया है। जबकि औरंगजेब के समकालीन पर्सियन इतिहासकार खफ़ी ख़ान के ऐतिहासिक ग्रन्थ ‘मन्तख़ब-उत-लुबाब’ जिसका सन 1849 में अंग्रेजी अनुवाद और सम्पादन जॉन डावसन और हेनरी मिर्स इलियट द्वारा किया गया है, में सतनामियों की एक दूसरी ही कहानी मिलती है। खफ़ी ख़ान द्वारा सतनामियों को साध्वी रूप से सम्बोधित किया है और इनके साधु के समान सात्विक जीवन जीने का उल्लेख किया हैं। साथ ही अपने सम्मान की लड़ाई के रूप में सतनामी विद्रोह का विस्तृत वर्णन किया है।
सन 1672 में सतनामी विद्रोह के उपरांत औरंगजेब के दमनकारी नीति से त्रस्त होकर सतनामियों का विशाल समुह उत्तर भारत को छोड़कर गुजरात, उत्तरप्रदेश, बिहार, उड़ीसा से होते हुए छत्तीसगढ़ में आकर बस गये। छत्तीसगढ़ के घने जंगलों में एवं महानदी के आस-पास के क्षेत्रों में सतखोजन दास अपने परिवार के सदस्यों शगुनदास, दयालदास, मेदनीदास के साथ भटगांव ज़मीदारी क्षेत्र में निवास करने लगे। बाद में मेदनीदास अपनी पत्नि मायावती एवं पुत्र महंगुदास को लेकर सोनाखान ज़मीदारी क्षेत्र के ग्राम गिरौद में आकर बस गये। ग्राम गिरौद वर्तमान छत्तीसगढ़ राज्य के बलौदाबाजार जिले के अंतर्गत आता है। महंगुदास जी का विवाह मड़वा गांव में पुराईन गोत्र की युवती अमरौतिन से हुआ था। महंगुदास एवं अमरौतिन के तीन पुत्रों का जन्म हुआ। प्रथम पुत्र ननकुदास, जिनका बाल्यवस्था में देहांत हो गया था। दुसरा पुत्र मनकुदास जी का जन्म सन् 1753 में तथा तीसरे पुत्र के रूप में छत्तीसगढ़ के महान ऐतिहासिक व्यक्तित्व संत गुरु घासीदासजी का जन्म 18 दिसम्बर सन् 1756 ई. को वर्तमान बलौदाबाजार जिले के गिरौद ग्राम में हुआ था। जिसे वर्तमान में सतनाम पंथ के तीर्थ के रूप में गिरौदपुरी कहा जाता हैं।
17वी सदी वह समय था जब छत्तीसगढ़ में कलचुरियों के शासन का अंत और मराठा शासन का उदय हुआ था और राज्य की जनता यहां के छोटे छोटे राजाओं, जमीदारो और पिण्डारियों के लूट से त्रस्त थी। धार्मिकता के नाम पर बलिप्रथा, तंत्र-मंत्र, जादू-टोना का बोलबाला था, स्त्रीवर्ग को सतीप्रथा और टोनही के नाम पर प्रताड़ित किया जाता था। धर्म और जात के आधार पर छुआछूत चरमसीमा में थी। इसका प्रभाव गुरु घासीदास जी पर भी पड़ा, उन्हें शिक्षा से वंचित होना पड़ा। गरीबी की वजह से घासीदास जी को परिवार के साथ दूसरों के खेतों में श्रम करना पड़ता था। बचपन मे घासीदास जी को घसिया से सम्बोधित किया जाता था। बाल्यावस्था से ही घासीदासजी सत्य के प्रति निष्ठावान और सत्याचरण की ओर प्रवृत्त थे। पारिवारिक दायित्व की अवस्था मे घासीदास जी का विवाह सिरपुर निवासी अंजोरी दास की कन्या सफुरा से हुआ था।
गुरू घासीदास एवं सफुराजी के तीन पुत्र- अमरदास, बालकदास,आगरदास और एक पुत्री सुभद्रा हुए।
गुरु घासीदास जी बाल्यावस्था से संत प्रवृति के थे। उन्होनें विभिन्न धार्मिक स्थलों के दर्शन किये थे, जिससे उनको सत्यनाम जपने का अनुराग उतपन्न हो गया था। गुरू घासीदास जातियों में भेदभाव, छुआछूत और समाज में भाईचारे के अभाव को देखकर बहुत दुखी थे। वे लगातार प्रयास करते रहे कि समाज को इससे मुक्ति दिलाई जाए। लेकिन उन्हें इसका कोई हल दिखाई नहीं देता था। सांसारिक कामों में मन न लगने के बावजूद वे घर चलाने में पिता की सहायता किया करते थे। कहा जाता है कि अकाल के कारण रोजी-रोटी की तलाश में परिवार के साथ उड़ीसा के कटक चले गए। जहां बाबा जगजीवन दासजी से उन्होंने सतनाम की शिक्षा ग्रहण की थी,जिसका प्रभाव उनके जीवन पर पड़ा।
एक दिन शांति की खोज में अपने भाई मनकुदास के साथ जगन्नाथपुरी जाते हुए वे अचानक सारंगढ़ से वापस लौट आए, उन्हें बोध हुआ कि मन की शांति मठों और मंदिरों में भटकने से नहीं मिलेगी बल्कि इसके लिए मन के भीतर ही ईश्वर को खोजना होगा। उनकी संत प्रवृत्ति और भक्ति का प्रभाव परिवार पर पड़ रहा था। अतः गुरु घासीदास जी घर छोड़कर गिरौदपुरी के पास ही सोनाखान क्षेत्र में जोंक नदी के किनारे छातापहाड़ के घने जंगलों में जाकर औंरा-धौंरा वृक्ष (आंवला और धावड़ा) और तेंदू वृक्ष के नीचे तपस्या कर सत्यनाम की साधना आरम्भ कर दी। जहां गुरु घासीदास जी को सत्य ज्ञान की अनुभूति हुई। वनों में एकात्म रूप से ज्ञान की प्राप्ति, प्रकृति के आध्यात्म और ज्ञान के द्वार को प्रदर्शित करता है। कई दिनों की तपस्या और साधना के पश्चात अनेक आश्चर्यजनक घटनाओं और चमत्कारों के कारण घासीदास जी का नाम सर्वत्र फैल गया और उन्हें संत की उपाधि दे दी गयी।
गुरु घासीदास ने सर्वप्रथम मूर्तिपूजा का विरोध कर मन मे ईश्वर के साक्षात्कार की अवधारणा को निम्न पंक्ति से सतनाम पंथ का आरंभ किया-
एक पेड़ अंवरा, दूसर पेड़ धंवरा साहब
चारो वरन नयै अमरित पियाये साहब
अपन घर ही के देव ला मनाबो,
मंदिरवा में का करे जाबो,
पथरा के देवता हालै नई तो डोले,
पथरा के देवता सूधे नई तो जानै हो,
ओमा का धूप अगरबत्ती चढ़ाबो।
मंदिरबा में का करे जाबो,
संत गुरु घासीदास ने समाज में व्याप्त कुप्रथाओं का कठोरता से विरोध किया। उन्होंने समाज में व्याप्त छुआछूत की भावना के विरुद्ध 'मनखे-मनखे एक समान' का संदेश दिया।
गुरू घासीदासजी गौतम बुद्ध के प्रभाव से अहिंसा का मार्ग अपनाने, पशुओं से प्रेम करने की सीख देते थे। वे किसी भी जीव पर क्रूरता पूर्वक व्यवहार करने के खिलाफ थे। गुरु घासीदास जी पर संत जगजीवनदास जी की शिक्षा का सर्वादिक प्रभाव रहा। अधिकांश विद्वानों का मत है कि इन्ही की प्रेरणा से गुरु घासीदास जी ने 'सतनाम पंथ' की स्थापना की। संत गुरु घासीदास द्वारा स्थापित सतनाम पंथ के अनुसार खेती के लिए गायों का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिये। इसके बाद संतगुरु जी भंडारपुरी में आश्रम निर्माण कर सतनाम का उपदेश देने लगे। गुरु घासीदास जी के सात वचन सतनाम पंथ के "सप्त सिद्धांत" के रूप में प्रतिष्ठित हैं, ये सिद्धांत है- सतनाम पर विश्वास, मूर्तिपूजा का निषेध, जाति एवं वर्णभेद की समाप्ति, हिंसा का विरोध, व्यसन से मुक्ति, पर-स्त्रीगमन की वर्जना और दोपहर में खेत न जोतना। उनका मानना था कि गृहस्थाश्रम में रहते हुए हमें सामाजिक बुराईयों को दूर रहकर सत्य, अहिंसा और परोपकार जैसे उच्च नैतिक आदर्शों का पालन करना चाहिए।
ब्राह्म समाज के संस्थापक राजा राम मोहन राय ने सती प्रथा, बाल विवाह, जाति तंत्र और अन्य सामाजिक कुरूतियों को समाप्त किया था, वहीं संत गुरु घसीदासजी ने इससे पूर्व ही लोगों में छुआछूत, टोनही वध, सत्ती प्रथा जैसी सामाजिक कुप्रथाओं को समाप्त करने, समता बनाए रखने और महिलाओं की शिक्षा, विकास, उद्धार करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण काम किए थे। भगवान बुद्ध के द्वारा शुरू किये गये सतनाम दर्शन को पहले संत कबीरदासजी ने स्वीकार किया और संत कबीर के बाद गुरु घासीदास ने ही सतनाम दर्शन का व्यापक विस्तार किया। समतावादी समाज के रचनाकार संतों रैदास, गुरुनानक, कबीर, नाभादास और जगजीवनदास आदि की क्रांतिकारी परंपरा को संत गुरु घासीदास ने ही आगे बढ़ाया। उन्होने पूरे छत्तीसगढ़ का दौरा कर सतनाम का प्रचार-प्रसार किया। उन्होंने सदैव दलित शोषित एवं पीड़ित लोगों का साथ दिया और उनका उत्थान किया। इनके द्वारा दिये गये उपदेशों से समाज के दलित असहाय लोगों में आत्मविश्वास, व्यक्तित्व की पहचान और अन्याय से जूझने की शक्ति का संचार हुआ। घासीदासजी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण व्यवस्था के विरुद्ध थे। पंथीगीतों मेें वर्णित 'चारों बरन ला अमरित पिलाएं' में उनका यही भाव था। उनके अनुसार ब्राह्मणों में भी शूद्र पैदा होते हैं और शूद्रों में भी ब्राह्मण पैदा होते हैं। क्षत्रियों में वैश्य पैदा हो जाते हैं और वैश्यों में क्षत्रिय पैदा हो जाते हैं। घासीदासजी के सतनाम के सिद्धांतों के प्रभाव से लगभग 80 जातियों के लोग सतनामी पंथ स्वीकार किया था। जिसमें चमार, सुनार, लुहार, गड़रिया, यादव, अहीर, तेली, कुम्हार, जाट, कुर्मी, बढ़ई आदि की विशेष रूप से भागीदारी थी। जिसकी पुष्टि इस पंथ गीत से होती है-
ब्राह्मण क्षत्री बनिया शूद्र चारों बरन के लोग
तब बनिन सतनामी, टोरिन भेद-भरम के रोग ला
सफा मिटाइन गया।
घासीदास गुरु बाबा पंथ ला चलाइन गा
गोंड कवंर कोरी घासी-चमरा महरा मोची
राउत अउ रोहिदास तेली सतनाम ल सोचिन
खुल गे हृदय कपाट गा।
डॉ. हीरालाल शुक्ल के मतानुसार वे केवल दलितों के ही मसीहा नहीं थे, अपितु संपूर्ण छत्तीसगढ़ के मसीहा बनकर उभरे थे। गुरू घासीदासजी ने सतनाम पंथ की ही नही सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ की अस्मिता की लड़ाई लड़ी थी।
गुरु घासीदास जी सतनाम पंथ के प्रचार प्रसार के लिए सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ प्रांत की सरगुजा से लेकर बस्तर तक की यात्रा की थी। सतनाम पंथ प्रचार के लिए 1806 में बस्तर के चिड़ईपदर प्रवास किये थे। यहां धर्मसभा रावटी कर लोगों को हिंसा त्यागने और सतमार्ग पर चलने की शिक्षा दी थी। उन्होंने दन्तेवाड़ा में दंतेश्वरी मन्दिर में जाकर पुजारियों से बलि प्रथा बंद करने की अपील की थी। उनके प्रभाव से बहुतायत संख्या में आदिवासी समुदाय ने सतनाम पंथ को अपनाया था। इसके साथ ही उन्होंने उड़ीसा, बिहार, उत्तरप्रदेश,वर्तमान मध्यप्रदेश, आंध्रप्रदेश,कर्नाटक,गुजरात,पंजाब और हरियाणा तक यात्रा कर सतनाम पंथ का उपदेश दिए थे।
सन् 1817 में सीताबर्डी नागपुर तृतीय आंग्ल – मराठा युध्द में मराठे पराजित हो गए और 1818 में नागपुर की संधि हुई जिससे छत्तीसगढ़ में ब्रिटिश कम्पनी का अप्रत्यक्ष शासन स्थापित हो गया. अब मराठे कम्पनी के अधीन शासन करने लगे थे। सन 1820 यह वह वर्ष था जब गुरु घासीदास जी द्वारा स्थापित सतनाम पंथ द्वारा अपने सम्मान और अधिकारों के लिए विद्रोह के रूप में सतनामी आंदोलन प्रारंभ हुआ, जो 10 वर्षो तक 1830 तक निरंतर जारी था। इस आंदोलन का नेतृत्व गुरु घासीदास जी के सिद्धान्तों के साथ गुर जी के द्वितीय पुत्र बालकदास जी ने किया था। जिनके ऊपर गुरु घासीदास जी के विचारों का प्रभाव बचपन से ही पड़ा था। सतनाम आंदोलन में बालकदास जी ने बढ़ चढ़कर अपना योगदान दिया था। 1820 से 1830 के मध्य छत्तीसगढ़ एक सांस्कृतिक क्रांति के दौर से होकर गुजरा था। रायपुर गजेटियर के अनुसार सन् 1820 से 1830 ई. के बीच छत्तीसगढ़ की लगभग 12% आबादी गुरु घासीदास की अनुयायी हो गई थी।
सतनामियों के संगठन और संघर्ष ने प्रतीक के रूप में सफेद झंडे का चुनाव किया था। जिसे जेत खान पर लहराया जाता था। पंथ में प्रातः और सायं सूर्योपासना की विधि प्रचलित थी। सतनामी धर्म के प्रवर्तक गुरू घासीदासजी भंडारपुरी को अपना धार्मिक स्थल के रूप में विकसित कर सतनाम पंथ को सत्य के प्रमाण शक्ति के साथ संगठित किये थे।उन्होंने सतनाम अर्थात सत्य के नाम से लोगों को साक्षात्कार कराया और सतनाम का प्रचार किया। गुरु घासीदास जी के अनमोल विचार और सकारात्मक सोच, हिन्दू और बौद्ध विचार धाराओं का संगम हैं। उन्होंने सत्य के प्रतिक के रूप में ‘जैतखाम’ को दर्शाया – यह एक सफ़ेद रंग किया हुआ लकड़ियों का खम्बा होता है जिसके ऊपर एक सफ़ेद झंडा फहराता है। इसके सफ़ेद रंग को सत्य का प्रतीक माना जाता है। उन्होंने प्रतीक चिह्न श्वेत धर्मध्वजा तथा जैतखाम की स्थापना कर सतनाम पंथ को एक धर्म का रूप दे दिया था। गुरु घासीदास जी का परिनिर्वाण भंडारपुरी में 20 फरवरी, 1850 को हुआ।
गुरु बालकदास के सतनामी आंदोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका के कारण गुरु घासीदास जी के बाद सन 1850 मे बालकदास जी को सतनामियों का प्रमुख गुरु बनाया गया। गुरु बालकदास जी ने नेतृत्व संभालने के बाद सतनाम आंदोलन को पूर्व की भांति पुनः सक्रिय कर पुरे गति से आगे बढ़ाया। कहा जाता है कि सतनामियों के बढ़ते प्रभुत्व के कारण सामंतवादी तत्वों ने 16-मार्च 1860 को गुरु बालकदास की हत्या करवा दी थी। उनके पार्थिव देह को नवलपुर- बेमेतरा मे दफ़न किया गया, जहां गुरु बालकदास की समाधि है।
गुरू घासीदासजी के संदेशों का समाज के पिछड़े समुदाय में गहरा असर पड़ा। सन् 1901 की जनगणना के अनुसार उस काल मे लगभग 4 लाख लोग सतनाम पंथ से जुड़ चुके थे और गुरू घासीदास के अनुयायी बन गए थे। कहा जाता है कि छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शहीद वीर नारायण सिंह पर भी गुरू घासीदास के सिध्दांतों का गहरा प्रभाव था। जिसके आधार पर बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय भी सतनाम पंथ से जुड़ गए थे। गुरू घासीदास के संदेशों और उनकी जीवनी का प्रसार पंथी गीत व नृत्यों के जरिए भी व्यापक रूप से हुआ। यह छत्तीसगढ़ की प्रख्यात लोक विधा भी मानी जाती है। गिरौदपुरी में सतनाम पंथ की गुरु गद्दी स्थापित हुई। 19वी सदी में सतनाम पंथ व्यापक प्रचार प्रसार से वृहद रूप से फैलने लगा था।
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में जन्मे गुरु घासीदास जी के वंशजो से ही सतनाम पंथ के परसूरामजी ने सतनाम पंथ से पृथक 'रामनामी सम्प्रदाय' की स्थापना की इसके संस्थापक और संरक्षक परसूरामजी थे। कहा जाता है कि एक कथावाचक ब्राह्मण से राम कथा सुनने के उपरांत परसुरामजी 'रामनामी सम्प्रदाय' की स्थापना की और अपने शरीर पर राम राम नाम को गुदवा लिया।इनके प्रभाव से बहुसंख्या में सतनामी से रामनामी हो गये और निर्गुण राम को छोड़कर शम्बूक के हत्यारे राजा राम के भक्त हो गए। यह सम्पूर्ण समुदाय अपने शरीर पर राम नाम के गुदना से पहचाना जाता है। यह सिर पर मोर का मुकुट धारण करते हैं।
सामाजिक तथा आध्यात्मिक जागरण की आधारशिला स्थापित करने में गुरु घासीदास जी ना केवल सफल हुए बल्कि आज भी सतनाम पंथ के अनुयायियों के लिए पुज्यनीय और ईश्वर तुल्य है। छत्तीसगढ़ में इनके द्वारा प्रवर्तित सतनाम पंथ के आज भी लाखों अनुयायी हैं।
गुरु घासीदास जी के संदेशों से प्रभावित होकर महात्मा गांधी जी और डॉ भीमराव अंबेडकर ने भी सतनाम पंथ के लिए महत्वपूर्ण कार्य किये।। महात्मा गांधीजी और अंबेडकर ने हरिजन का उद्घोष कर पंथ को राष्ट्रव्यापी सम्मान और अधिकार की विधिक अवधारणा रखी।
छत्तीसगढ़ राज्य में गुरु घासीदास की जयंती 18 दिसंबर से माह भर व्यापक उत्सव के रूप में समूचे राज्य में पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाती है। इस उपलक्ष्य में गाँव-गाँव में मड़ई-मेले का आयोजन होता है। गुरु घासीदास जी की जन्मस्थली ग्राम गिरौदपुरी को सतनाम पंथ के तीर्थ के रूप में माना जाता है, जहाँ प्रत्येक वर्ष दिसम्बर माह में उनके जन्म दिवस 18 दिसम्बर के अवसर पर अनुयायियों का वृहत मेला लगता है।
छत्तीसगढ़ में सतनाम पंथ के अनुयायियों के द्वारा निर्गुण भक्ति धारा से प्रेरित गीत और नृत्य के माध्यम से संत गुरू घासीदास बाबा के जीवन चरित्र एवं उनके उपदेशों का वर्णन किया जाता है,जिसे पंथी गीत और नृत्य कहा जाता है। यह बहुत ही ऊर्जावान नृत्यकों द्वारा किया जाने वाले नृत्य है। जिसमे गोल घेरे में मानव पिरामिड बनाकर खतरनाक कला का प्रदर्शन भी किया जाता है। इस गीत और नृत्य में प्रमुख वाद्य यंत्र के रूप में झांझ मंजीरा, मांदर तथा ढोलक का प्रयोग किया जाता है। पंथी नृत्य छत्तीसगढ़ की प्रमुख सांस्कृतिक धरोहर है। जिसमे प्रमुख नृत्यकों में स्वर्गीय देवदास बंजारेजी का नाम उल्लेखनीय है।
गुरु घासीदास स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए 1983 ई. में बिलासपुर में गुरु घासीदास विश्वविद्यालय की स्थापना की गयी थी जिसे सन् 2009में केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा दे दिया गया है। साथ ही गुरु घासीदास की स्मृति में भारत सरकार द्वारा 1987 में डाक टिकट जारी किया गया था।
गुरु घासीदास की जन्मभूमि गिरौदपुरी में छत्तीसगढ़ शासन द्वारा 2015 को कुतुब मीनार से भी लगभग पाँच मीटर ऊँचे, 253फीट(77 मीटर) के जैतखाम का निर्माण किया गया है। जिसके निर्माण की आधारशिला 2008 में रखी गयी थी।यह जैतखम सत्य और सात्विक आचरण का प्रतीक माना जाता है।
छत्तीसगढ़ शासन ने उनकी स्मृति में सामाजिक चेतना और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में 'गुरु घासीदास सम्मान' स्थापित किया है।
घासीदास का जीवन-दर्शन युगों तक मानवता का संदेश देता रहेगा। गुरु घासीदास आधुनिक युग के सशक्त सामाजिक और धार्मिक क्रांतिकारी गुरु थे।
जय छत्तीसगढ़।।
कमलेश कुमार टाण्डेय








Jai chhattisgarh
ReplyDelete